
18 January 2012
एकता और भाई चारे ही में है भारत की शान !

08 January 2012
जो हो सके तो अमन का मन्ज़र तलाश कर !!
चाकू न सैफो बरछी न खन्जर तलाश कर !
जो हो सके तो अमन का मन्ज़र तलाश कर !!
जिस पर जबीं झुकी थी वो दर तलाश कर !
जिस घर को तुने छोड़ा है वो घर तलाश कर !!
खामोश हो गया हूँ समंदर की तरह मै !
है मुज़्तरिब जो करना तो कंकर तलश कर !!
कहने पे तेरे माँ को भला कैसे छोड़ दू !
तू ऐसा कर कि दूसरा शौहर तलाश कर
परदेस में सुकून किसे मिलता है "हिलाल"
चैनो सुकून अपने ही घर पर तलाश कर !!
तसव्वुराते यार से मिटी है सारी दूरियां !!
31 October 2011
लफ्जों का जादू
गहरी नींद
इक दीप तुम जलाओ इक दीप हम जलाएं

15 October 2011
क्यों अदीब अब तक है खोये ज़ुल्फ़ और रुखसार में !!
07 October 2011
बेवफाई भी ज़रूरी है वफ़ा से पहले !!
27 June 2011
पहले दिल दिल में कोई राह बनायीं जाए !!
पहले दिल दिल में कोई राह बनायीं जाए !!
जिसमे सच्चाई की लज्ज़त हो वफ़ा की खुशबु !
मुंह से बस ऐसी क़सम वक़्त पे खायी जाए !!
दूरियों से तो कोई बात न बन पायेगी !
आओ मिल जुल के कोई बात बनायीं जाए !!
राह वो जो के भलाई की तरफ जाती हो !
सारी दुनिया को वो ही राह दिखाई जाए !!
आज की बीवियां ये सोचती रहती है सदा
माँ के हाथो में न शौहर की कमाई जाए !!
शर्म से चेहरा छुपा लेगा घटा में सूरज !
चेहरा ऐ हुस्न से चिलमन तो हटाई जाए !!
मत सुनाओ मेरी रूदादे मुहब्बत सबको !
जिससे रुसवाई हो वो बात छुपाई जाए !!
इश्क का दरिया हमे पार जो करना है हिलाल
कश्तिये इश्क सलीके से चलायी जाए !!
15 June 2011
तेरी आँखों से लड़ गयीं आँखें !
14 June 2011
पीने की और जिद न करो तुम नशे में हो !
10 June 2011
अजनबी से अजीब रिश्ते है !
06 June 2011
अब किसी और के हाथो में है हाथ उसके 'हिलाल'
30 May 2011
मेरी मसरूफियत ने ही मुझे तनहा कराया है !!
14 May 2011
एक आरजू
05 March 2011
तुझे देखा था पिछली साल पहली बार होली में !

तुझे देखा था पिछली साल पहली बार होली में !
खुशाकिस्मत जो फिर से हो तेरा दीदार होली में !!
नज़र आने लगे यूँ प्यार के आसार होली में !
झुका के नज़रें उसने जब किया इकरार होली में !!
लगाया क्या गुलाबी रंग हमने तेरे चेहरे पर !
हुए है और भी ज्यादा हंसी रुखसार होली में !!
शरारत करने का मौक़ा मिला है आज किस्मत से !
हमे जी भर के रंगने दे न कर इनकार होली में !!
भुला कर सब गिले शिकवे चलो हम एक हो जायें !
खलिश दिल की मिटा डालें बढाएं प्यार होली में !!
गले हम भी मिलें तुमसे गले तुम भी मिलो हमसे !
न हो पाए कोई रंजिश कोई तकरार होली में !!
कहीं ना इत्तेफाकी का निशाँ बाकी न मिल पाए !
मुहब्बत की उड़े पिचकारियों से धार होली में !!
हमें छुप छुप के वो देखें, उन्हें छुप छुप के हम देखें !
हिलाल ऐसा मज़ा आता रहे हर बार होली में !!
06 January 2011
यह वर्ष हम सभी को हर तरह रास आये
यह वर्ष हम सभी को हर तरह रास आये--घर घर में शांति हो हर बच्चा मुस्कुराये
21 November 2010
ज़िन्दगी में तुम्हारी कमी रह गयी
ज़िन्दगी में तुम्हारी कमी रह गयी
तू न आया न ही ख्वाब आये तेरे
तुझसे आँखों को नाराजगी रह गयी
अक्स क्या उड़ गया तेरा अलफ़ाज़ से
खाली बे रंग की शायरी रह गयी
अपने घर से चला जब मै परदेस को
दूर तक माँ मुझे देखती रह गयी
वो मेरे दिल से आकर चला तो गया
उसके क़दमो की कुछ ताजगी रह गयी
उससे मिलकर भी कब कह सका राज़-ऐ-दिल
बात मुंह की मेरे मुंह में ही रह गयी
उससे चाहा वफाओं का इकरार जब
उसके होंठो पे इक खामशी रह गयी
उसने इक बात भी मेरी चलने न दी
सारी तोहमत मेरे सर मढ़ी रह गयी
बाद-ऐ-तर्क-ऐ-मुहब्बत वो मुझसे 'हिलाल'
क्यों समझता है के दोस्ती रह गयी
कोई ज़ालिम किसी मजलूम पर जब ज़ुल्म ढाता है!
ये मन्ज़र देखकर मेरा कलेजा काँप जाता है !
जो इस दर्द-ऐ-ग़म-ऐ-फुरक़त1 का अंदाज़ा लगता है !
वो मेरे आंसुओं की कद्र करना सीख जाता है !
मुहब्बत में बिछड़ने वाला अपनी जाँ गवाता है ?
न जाने कौन सी सदियों की तू बातें सुनाता है !
गुनाहों की नदामत2 से मै अपना मुंह छुपाये हूँ
कफ़न ये मेरे चेहरे से ज़माना क्यूँ हटाता है !
मै आँखों के लिए हर पल उसी के ख्वाब चुनता हूँ !
वो है के मेरी आँखों से मेरी नींदें चुराता है !
भुलाना चाहता है वो भुलाये शौक़ से लेकिन !
हुनर ये भूल जाने का वो मुझसे क्यूँ छुपाता है !
हथेली उम्र भर को ज़र्द3 पड़ जाती है फुरक़त4 में !
किसी का हाथ जब हाथों में आकर छूट जाता है !
तुम्हारी याद का मौसम बहुत ही सर्द है, उस पर
हवा करती है सरगोशी , बदन ये काँप जाता है !
हिलाल इस दौर में कमज़ोर की सुनता नहीं कोई
जिसे देखो वो ही कमज़ोर को आँखें दिखाता है !
१-जुदाई के ग़म का दर्द २-शर्मिंदगी ३-पीली
25 October 2010
जब चमन पुरबहार होते हैं
जब चमन पुरबहार होते हैं
खार भी लालाज़ार होते हैं
कौन साथी है दौर-ऐ-ग़ुरबत का
सब बनी के ही यार होते हैं
हम गिला क्या करें जफ़ाओं का
जब सितम बार बार होते हैं
टूट जाते है चन्द बातों से
रिश्ते कम पायदार होते हैं
अजनबी हमसफ़र तो ऐ लोगों
रास्ते का गुबार होते हैं
आज के दौर की अदालत में
बेगुनाह गुनाहगार होते हैं
जिनमे इमरज-ऐ-बुग्ज़-ओ-कीना हो
क़ल्ब वो दाग़ दार होते है
यूँ न अबरू को दीजिये जुम्बिश
हम तो खुद ही शिकार होते है
ये हकीक़त है आज महलों की
मकबरों में शुमार होते हैं
नाज़ खुद पर "हिलाल" मत करना
तुझसे शायर हज़ार होते है